Saturday, 14 October 2017

घर जाने का एक्साईटमेंट

घर छोड़े हुए 3 महीने हो गए, लेकिन मन अभी भी घर में अटका हुआ है। वही दीवारें, पेड़-पौधे, आस-पास के लोग सब याद आ रहे हैं। होस्टल जाते टाईम ये ही सोच रही थी कि घर कब आना होगा, मन को तसल्ली थी कि दिवाली पर छुट्टी मिलेगी। दिवाली की छुट्टियां मिल ही गई, हम सब चले अपने-अपने घर। ओर अब तो मैं हम में बदल गया है क्योंकि होस्टल में साथ रहती फ्रेंड़स भी अब मेरे लाईफ का पार्ट बन चुकी हैं। इन्हीं फ्रेड़स के रहते टाईम कहाँ निकल गया पता ही नहीं चला। 14 अक्टूबर जिस तारीख का सबको बेसब्री से इंतज़ार था, वो आ ही गई और हम सबने पैकिंग भी कर ली दो दिन पहले। फर्स्ट टाईम घर जाने का मज़ा कुछ ओर ही है.. जिसे शब्दों में बता पाना मुश्किल है। आई एम कमिंग होम..

Sunday, 8 October 2017

फ़िफ्थ प्रपोजल

लाईफ का पाँचवाँ प्रपोजल, बस सबको मना करती गई... दिल में एक वही है आज तक जिस के लिए सबने बोला तेरे लिए अच्छा नहीं है ये लड़का।
खैर, पाँचवाँ प्रपोजल में ना जान ना पहचान बस आशीष को ना कहने के बाद भी उसका बोलना इंतज़ार रहेगा तुम्हारा। यार हम दोस्त रहेंगे मैं सिंगल रहना चाहती हूँ अभी। कोई नहीं, चलो हम दोस्त तो रहेंगे ही लेकिन फिर भी आई लव यू...तुम बहुत अच्छी हो यार।
अच्छा सुनो दोस्ती में मिलते रहना चाहिए क्या हम दोनों कहीं मिल सकते हैं यार अभी पासिवल नहीं है। मैं बहुत दूर रहती हूँ दिल्ली से,नहीं पता कब वापस आऊंगी दिल्ली। कोई नहीं मैं आ जाता हूँ तुमसे मिलने... क्या बिना मिले दोस्ती नहीं चल सकती क्या? अरे! मिलने से बोंड  स्ट्रांग होता है।
ठीक है जब दिल्ली आऊंगी तब हम पक्का मिलेंगे।
ओर हाँ हम हमेशा दोस्त रहेंगे।

What covid taught us?

In 2020, our world has suffered from a huge pandemic situation. Economic situation of all the countries got stuck. Many people migrated to t...