Monday, 20 November 2017

घरों में कामों का बँटवारा

आँख खोलते ही कुछ चीजें हम बिना सिखाए सीख जाते हैं । उनमें से एक है काम, काम और काम का बँटवारा । यानी ये काम लड़के कर सकते हैं और ये लड़कियाँ ।
क्या वाकई में ऐसा है़? काम में भी लड़का और लड़की होता है। अगर प्रक्रति से मिले कुछ काम छोड़ दें तो बाकि काम कैसे हो गए।
हम कौन–कौन से कामों की बात कर रहे हैं, वे क्या हैं? घर के अंदर से जुड़े हैं? घर के अंदर काम कितने हैं? घर के बाहर कितने काम हैं? सड़क के कितने काम हैं? बिल्डिंग के कितने काम हैं? क्या काम चुनने से पहले ज़हन में लड़के या लड़की का ख्याल आता है।
अच्छा ज़रा सोचते हैं ऐसा कौन–सा काम है जो लड़के कर सकते हैं, लेकिन लड़कियाँ नहीं कर सकती।
साथ ही यह भी सोचते हैं कि घर में ऐसा कौन–सा काम है जो लड़कियाँ तो कर सकती हैं, पर लड़के नहीं कर सकते? जवाब मुश्किल नहीं है। लड़कियाँ, स्त्री, महिलाँए हर वह काम कर लेती हैं, जो आमतौर पर लड़कों, पुरुषों के काम माने जाते हैं।
खुशहाली का बड़ा राज़ इस काम में भी छिपा है। कुछ करने में या ना करने में खुशी छिपी बैठी है जनाब।
आप ना सिर्फ अच्छे मर्द साबित होंगे बल्कि उससे बढ़कर आप एक बेहतर इंसान साबित होंगे।
यहाँ सिर्फ बात एक छोटे से दायरे तक सिमित है। बड़े दायरे में चर्चा नहीं हो रही है। अपने उसी को दायरे तक सीमित रखेंगे, जिस दायरे में किसी लड़के का सित्री जाति से पाला पड़ता है। यह दायरा ज्यादा घर का है।
हम चाहे आज भी कितना भी बोल लें कि हमारी सोच मॉडर्न ज़माने कि हो चुकी है, इन बातों पर आज भी हम पुराने ख्यालों के हैं। रिश्तेदारों, पड़ोसियों को दिखाने के लिए लड़के–लड़की अच्छे स्कूल में भेजते हैं। लेकिन बात फिर भी यहाँ खत्म नहीं होती घर के काम में बंटवारा हो ही जाता है यह काम भाई करेगा, यह बहन करेगी।
हम काम के साथ–साथ पार्टनर चुनने कि बात करूं तो इतना तय है कि लडकों से ही पूछा जायेगा कि कैसा पार्टनर चाहिए? अहम बात यह है कि हमारी–आपकी उम्मीद तब ही बेहतर तरीके से परवान चढ़ सकती हैं जब हम–आप एक–दूसरों को समझने लगते हैं।
मर्द घर का काम करना खुद सीखें। बहुत मौज करेंगे। आमतौर पर घर के काम घरेलू काम मान लिए गये हैं। यानि स्त्री के काम हैं। ये काम समाज ने ही स्त्रियों को सौंप दिए हैं। घर के बाहर काम होने वाले काम मर्दों के हैं। गैरबराबरी का रिश्ता तो यहीं से शुरू होता है। इसलिए सबसे पहले आइए घर का काम करना सीखते हैं। जी सीखना पड़ेगा क्योंकि मर्द बनने के चक्कर में मर्दों ने तो यह सीखा ही नहीं। ओर ऊपर से मर्द बनाने के चक्कर में सिखाया नहीं गया।
मर्द लोग घर का काम तो सीखें ही, अपने आने वाली मर्द पीढ़ी को भी सिखाएं। यानी माँ–बाप अपने बेटों को घर का काम करने के लिए बढावा दें। उनसे चूल्हा–चोखा करवाएं। मर्द खाना बनाना सीखें।
तो सबसे पहले की घर कि बात। दादी–नानी ओर माँ के ज़माने की महिलाओं ओर आज कि लड़कियों में थोडा फर्क करना होगा, जनाब। इसलिए रिश्ते, घर–परिवार, रहन–सहन वैसे ही नहीं चल सकते जैसे उनके ज़माने चला करते थे। हालांकि चलना तो उनके ज़माने में भी नहीं चलने चाहिए थे। इसलिए घर–रिश्ते सब में बदलाव करना होगा। कुछ संस्कारों, रीति–रिवाज़ों, परम्पराओं को छोड़ना पड़ेगा। वक्त बदलेगा तो चीज़े बदलेंगी।
लड़कियाँ क्या चाहती हैं,  हमारा–आपका,  सबका सुखी जीवन इससे गहरे जुड़ा है।

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